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CGSCPCR Rules 2009

छत्तीसगढ़ बाल अधिकार संरक्षण आयोग नियम २००९ के प्रमुख प्रावधान

राज्य शासन ने बालक अधिकार संरक्षण आयोग अधिनियम 2005 की धारा 36 में प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग करते
हुए छत्तीसगढ़ बाल अधिकार संरक्षण आयोग नियम 2009 बनाये हैं। यह नियम राज्य शासन की अधिसूचना दिनांक 16 जून 2010 द्वारा लागू किये गये हैं जो कि छत्तीसगढ़ राजपत्र (असाधारण) दिनांक 17 जून 2010 में प्रकाशित हुए हैं। इन नियमों के अनुसार आयोग निम्नलिखित समस्त या किन्हीं कृत्यों का पालन करेगा:-

आयोग के कार्य  -
(क) बाल अधिकारों के संरक्षण के लिये तत्समय प्रवृत्त किसी विधि द्वारा या उसके अधीन उपबंधित रक्षोपायों का परीक्षण तथा पुनर्विलोकन करना तथा उन रक्षोपायों के प्रभावी क्रियान्वयन के लिये उपायों की अनुशंसा करना।
(ख) प्रतिवर्ष और ऐसे अंतरालों पर जैसा आयोग उचित समझे, राज्य सरकार को उन रक्षोपायों के कार्यकरण पर रिपोर्ट देना।

(ग) बाल अधिकारों के अतिक्रमण का अन्वेषण करना और ऐसे प्रकरणों पर कार्यवाही शुरू करने की अनुशंसा करना।
(घ) आंतकवाद, सांप्रदायिक हिंसा, दंगे, प्राकृतिक आपदा, घरेलू हिंसा, एचआईवी/एड्स, दुर्व्यापार, दुर्व्यवहार, प्रताड़ना तथा शोषण अश्लील चित्रण तथा वैश्यावृत्ति द्वारा बालकों के अधिकारों को प्रभावित करने वाले समस्त कारणों का परीक्षण करना और ऐसे मामलों में समुचित उपचारात्मक उपायों की अनुशंसा करना।
(ड.) विशेष देखभाल और संरक्षण की आवश्यकता वाले बालक, जिनमें कठिन परिस्थितियों में बालक, उपेक्षित और प्रतिकूल परिस्थितियों में बालक, अपचारी बालक, किशोर, परिवार रहित/निराश्रित बालक तथा बंदियों के बालक सम्मिलित है, से संबंधित मामलों को देखना तथा समुचित उपचारात्मक उपायों की अनुशंसा करना।

(च) बाल अधिकारों के बारे में संधियों (ट्रीटीज) तथा अन्य अन्तर्राष्ट्रीय विलेखों का अध्ययन विद्यमान नीतियों, कार्यक्रमों तथा अन्य गतिविधियों का नियतकालीन पुनर्विलोकन की जिम्मेदारी लेना तथा बालकों के सर्वोत्तम हित में उनके प्रभावी क्रियान्वयन की अनुशंसा करना।
(छ) बाल अधिकारों के क्षेत्र में शोध करना तथा उसे बढ़ावा देना।
(ज) समाज के विभिन्न वर्गो में बाल अधिकारों की जानकारी को प्रसारित करना तथा प्रकाशन, मीडिया, सेमीनार तथा अन्य उपलब्ध स्त्रोतों के माध्यम से इन अधिकारों के लिये उपलब्ध रक्षोपायों के प्रति जागरूकता बढ़ाना।

झ) केंद्र सरकार या राज्य सरकार या अन्य किसी प्राधिकारी के नियंत्रणाधीन किसी भी किशोर बंदीगृह या बालकों के निवास का कोई अन्य स्थान या ऐसी संस्था जो बालकों के लिये बनी हो, जिसमें किसी सामाजिक संगठन द्वारा संचालित कोई ऐसी संस्था सम्मिलित है, जहाँ बच्चों को निरूद्ध किया जाता हो या इलाज, सुधार या संरक्षण प्रयोजन के लिये रखा जाता हो, का निरीक्षण करना या निरीक्षण करवाना तथा यदि आवश्यक पाया जाये तो ऐसी उपचारात्मक कार्यवाही के लिये उन प्राधिकारियों तक ले जाना.(ञ) निम्नलिखित से संबंधित विषयों पर शिकायतों की जांच करना और स्वप्रेरणा से ध्यान देना:-

1. बाल अधिकारों का वंचन या अतिक्रमण.2. बालकों की रक्षा और उनके विकास के लिये उपबंधित विधियों का अक्रियान्वयन.3. बालकों की कठिनाईयों को कम करने और उनका कल्याण सुनिश्चित करने तथा ऐसे बालकों को अनुतोष उपलब्ध कराने के प्रयोजनार्थ नीतिगत विनिश्चयों, मार्गदर्शक सिद्धांतों या अनुदेशों का अनुपालन या ऐसे विषयों में उदभूत प्रश्नों को समुचित प्राधिकारियों के समक्ष उठाना और
(ट) किसी ऐसे मामले के संबंध में राज्य सरकार द्वारा यथाविनिर्दिष्ट कर्तव्यों का पालन करना।

आयोग के अतिरिक्त कार्य :-

आयोग नियम 9 के अधीन उसे समनुदेशित कृत्यों के अतिरिक्त निम्नलिखित कृत्यों का भी निर्वहन करेगा अर्थात्:-
(क) बाल अधिकार पर अभिसमय के अनुपालन का निर्धारण करने के लिये विद्यमान विधि, नीति और प्रथा का विश्लेषण करना, बालकों को प्रभावित करने वाली नीति या प्रथा के किसी पहलू के संबंध में जांच करना और रिपोर्ट प्रस्तुत करना तथा बाल अधिकार परिप्रेक्ष्य में प्रस्तावित नए विधान पर टिप्पणी करना.(ख) राज्य सरकार को उन रक्षोपायों के कार्यकरण पर प्रतिवर्ष और ऐसे अन्तरालों पर, जैसा आयोग ठीक समझे, रिपोर्ट प्रस्तुत करना।
(ग) वहां औपचारिक अन्वेषण करना जहाँ  स्वयं बालकों द्वारा या उनकी ओर से संबंधित व्यक्ति द्वारा चिन्ता अभिव्यक्त की गई है।
(घ) यह सुनिश्चित करना कि आयोग का कार्य बालकों के दृष्टिकोण से सीधे सूचित किया जाता है जिससे उनकी प्राथमिकताओं तथा परिपेक्ष्यो को परिलक्षित किया जा सकें।
(ड.) अपने कार्य में तथा बालक से संबंधित समस्त सरकारी विभागों तथा संगठन के कार्य में बालकों के दृष्टिकोण को प्रोन्नत करना, उनका आदर करना तथा उन पर गंभीर विचार करना।
(च) बाल अधिकारों के संबंध में जानकारी प्रस्तुत करना तथा उसका प्रचार करना।
(छ) बालकों के संबंध में आंकड़े संकलित करना तथा उनका विश्लेषण करना और
(ज) विद्यालय पाठ्यक्रम, अध्यापकों के प्रशिक्षण तथा बालकों से संबंधित कार्मिकों के प्रशिक्षण में बाल अधिकारों
के समावेश को प्रोन्नत करना. आयोग द्वारा प्राप्त परिवादों को निपटाने हेतु भी कार्यवाही किये जाने का प्रावधान है। परिवादों  के लिए
कोई फीस देय नहीं होता है।

आयोग को प्राप्त शक्तियां:-

1. जांच से संबंधित शक्तियाँ:-
आयोग स्व-प्रेरणा से भी प्रकरणों का संज्ञान लेकर कार्यवाही कर सकता है। राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग को अधिनियम की धारा 13 की उपधारा (1) के खण्ड () में निर्दिष्ट किसी विषय की जांच करते समय और विशिष्टतया निम्नलिखित विषयों के संबंध में वे सभी शक्तियां दी गई है जो सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का 5) के अधीन किसी वाद का विचारण करते समय सिविल न्यायालय को होती हैं, अर्थात्:-
(क) किसी व्यक्ति को समन करना और हाजिर कराना तथा शपथ पर उसकी परीक्षा करना,
(ख) किसी दस्तावेज का प्रकटीकरण और पेश किया जाना,
(ग) शपथ पत्रों पर साक्ष्य लेना,
(घ) किसी न्यायालय या कार्यालय से किसी लोक अभिलेख या उसकी प्रतिलिपि की अध्यपेक्षा करना, और
(ड) साक्षियों या दस्तावेजों की परीक्षा के लिए कमीशन निकालना।

(2) आयोग को किसी मामले को ऐसे मजिस्ट्रेट को भेजने की शक्ति होगी जिसे उसका विचारण करने की अधिकारिता है और वह मजिस्ट्रेटजिसे कोई ऐसा मामला भेजा जाता है, अभियुक्त के विरूद्ध परिवाद सुनने के लिए इस प्रकार अग्रसर होगा मानो वह मामला दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) की धारा 346 के अधीन उसको भेजा गया है।

2. जांच के पश्चात् कार्रवाई.-
आयोग किसी जाँच के पूरा होने पर निम्नलिखित कार्यवाही कर सकेगा:-
1 बच्चों के अधिकारों का हनन या किसी कानून का उल्लंघन पाया जाने पर सरकार या प्राधिकारी को संबंधित के विरूद्ध अभियोजन या अन्य कोई कार्यवाही जो आयोग उचित समझे आरंभ करने के लिये अनुशंसा कर सकता हैं ।
2 उच्चतम न्यायालय या उच्च न्यायालय में न्यायालय से समुचित निर्देश आदेश  रिट जारी करने के लिये अनुरोध कर सकता हैं ।
3 पीड़ित पक्ष के लिये तत्काल अंतरिम सहायता जो आयोग उचित समझे उसके लिये सरकार या किसी प्राधिकारी को सिफारिश  कर सकता हैं ।

3. नि:शुल्क एवं अनिवार्य बाल शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009 के अन्तर्गत राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग को प्राप्त शक्तियां

अधिनियम का अध्याय 6- बालकों के अधिकारों का संरक्षण अनिवार्य तथा नि:शुल्क शिक्षा का अधिकार अधिनियम के अन्तर्गत राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग को इस कानून के द्वारा किये गये अधिकारों के रक्षोपायों की परीक्षा करने पुनर्विलोकन करने तथा प्रभावी क्रियान्वयन के लिये आवश्यक अनशसाये करने के अधिकार दिये गये हैं । इसके अतिरिक्त इस अधिनियम संबंधी परिवाद की जाँच के भी अधिकार दिये गये हैं । अधिनियम की धारा 32 के अनुसार कोई व्यक्ति इस अधिनियम की प्रथम शिकायत स्थानीय प्राधिकारी को कर सकता है तथा स्थानीय प्राधिकारी के निर्णय से व्यथित होने पर राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग को अपील कर सकता हैं ।

शिकायत कैसे करें:-
1 बच्चों के अधिकारों का हनन होने पर कोई भी व्यक्ति आयोग को लिखित शिकायत कर सकता है । शिकायत तार ई-मेल व फैक्स के माध्यम से भी की जा सकती है ।
2 परिवादों के लिये कोई भी फीस देय नहीं होती है ।
3 आयोग स्व प्रेरणा से भी संज्ञान ले सकता है ।
4 साधारणतः आयोग ऐसे प्रकरण ग्राह्य नहीं करता है जो परिवाद प्रस्तुत करने के एक वर्ष पूर्व घटित हुयें हों या जो न्यायाधीन हैं जो अस्पष्ट या गुमनाम या छद्म नाम से हैं जो तुच्छ प्रकृति के हैं या जो आयोग की अधिकारिता के बाहर हैं ।